मेरा सच-चरण 16
इस तरह 12 वीं कक्षा की पढाई और ब्यूटी पार्लर का कोर्स साथ साथ चल रहा था।12वीं मे भी फर्स्ट डिवीज़न की तैयारी कर रही थी पर घर का काम,ब्यूटी पार्लर का काम,कठिन विषय सब एक साथ होने से मैं 12वीं मे सेकंड डिवीज़न से ही पास हो पाई।12वीं कक्षा पास होते ही एक दिन पापा ने कहा कि एक डेढ़ साल से पार्लर जा रही है,पर वहां से ऑटो किराया तक भी तू नहीं ला पाती है,आखिर कब तक बिना पैसों के वहाँ काम करेगी।अगर वो तुजे पेमेंट देते हैं तो तू पार्लर जा वर्ना कोई जरुरत नहीं है वहां जाने की,और अब तो वैसे भी साल छह महीने मे तेरी शादी करनी है।पापा ने तो अपनी बात कह दी पर मुझे पेमेंट की बात उन ब्यूटिशियन मेडम से कहने मे बहुत जिझक लग रही थी कि जिन दीदी ने मुझे बिना पेमेंट के पूरा कोर्स कराया ,उनसे पैसों की बात कैसे करूँ?तीन चार दिन सोचती रही फिर एक दिन हिम्मत करके उन दीदी से कुछ पेमेंट देने की बात सामने रख दी।जैसे ही मैंने बात बोली कि उन दीदी की नाराजगी निकल गई कि मैंने तुमसे कोर्स सिखाने के पैसे नहीं मांगे तो तुम यहाँ काम करने के पैसे कैसे मांग सकती हो?वही हुआ जिसका मुझे डर था। उन्होंने मुझे ब्यूटी कोर्स कराके जो एहसान किया था उसके बदले उन्हें नाराज करने के बारे मे मैं सोच भी नहीं सकती थी? एक तरफ पापा का गुस्सा और दूसरी तरफ अपने गुरु की नाराजगी।। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ?लेकिन अंदर ही अंदर मुझे ईश्वर का एक संकेत मिल रहा था अब जीवन का ये पड़ाव शायद खत्म हो रहा है और इस पार्लर को छोड़ने का समय आ गया है।मैंने उन दीदी से चरण छूकर आर्शीवाद लिया और कहा कि इस डेढ़ साल मे अगर मुझसे कोई भूल हो गई हो तो मुझे माफ़ कर देना और उनसे विदा ली।हालांकि दीदी को मेरा ब्यूटी पार्लर छोड़ना पसंद नहीं आ रहा और मुझे भी बुरा लग रहा था पर शायद मेरा वहां रहने का समय उतना ही था।उनका एहसान था मुझ पर इसलिये मैंने ये निश्चय किया कि मैं अपने इस कोर्स का सर्टिफिकेट कभी नहीं लुंगी।
अब तो पार्लर छोड़ कर घर पर ही रहती और घर के काम करती।करीबन 15 दिन ही हुए थे कि एक दिन किसी पडोसी ने बताया कि अखबार मे इस्तिहार आया है कि किसी ब्यूटी पार्लर पर हेल्पर की जरुरत है ,मैंने जैसे ही सुना और जल्दी से उस पार्लर पर इंटरव्यू देने चली गई। नियम के मुताबिद 1 सप्ताह के ट्रायल पर मुझे बुला लिया।मैं अगले दिन से एक और नए पार्लर पर जाने लगी। इस बार मेरी
ट्रेंनिंग पहले की तरह अधूरी नहीं थी बल्कि परफेक्ट थी।एक सप्ताह के ट्रायल मे उनको मेरा काम पसंद आ गया और उन्होंने मुझे 600 रूपये महीने की पगार पर रख लिया।मुझे इतनी ख़ुशी हुई ,क्योकि वह मेरी पहली नोकरी थी। अब तो मै वापस से घर से 9 बजे निकल जाती और 5 बजे घर आती। पहली नोकरी का उत्साह इतना था कि एक भी दिन छुट्टी नहीं करी और टाइम से टाइम पहुँच जाती।महीना बीता और मुझे पगार मिलने ही वाली थी कि एक दिन ब्यूटी पार्लर पर काम करते करते एक बहुत बड़ी कांच की कोई मशीन गलती से मेरे हाथ से नीचे गिर गई और टुकड़े टुकड़े हो गए।मशीन बहुत महँगी थी तो उस पार्लर की मेडम मुझसे बहुत नाराज हुई और कहा कि अब तुम्हे पगार नहीं मिल सकती बल्कि इतनी महंगी मशीन के नुकसान की भरपाई के लिए तुम्हे तीन महीने की पगार छोड़नी पड़ेगी।जीवन की पहली नोकरी पर कदम रखते ही इतनी बड़ी परीक्षा देनी पड़ी।एक तरफ फ्री मे काम करना और दूसरी तरफ पापा मम्मी की बाते सुनना मेरे लिए किसी कसौटी से कम नहीं था।
थोड़े दिन बाद कॉलेज के फॉर्म भरने लगे,मैंने भी बी ए फर्स्ट ईयर प्राइवेट परीक्षा के लिए फॉर्म भरा।प्राइवेट करने के लिए मेरा संगीत विषय छोड़ना पड़ा और उसकी जगह इतिहास लेना पड़ा। तीन महीने फ्री मे काम करने के बाद पापा ने वापस से ब्यूटी पार्लर का काम छोड़ने के लिए बोल दिया।नोकरी भी करी लेकिन एक भी पगार की ख़ुशी नहीं मिली,पर उस समय ने मुझे दुनिया की पहचान कराई ,मेहनत की कीमत समझाई, उन तीन महीनो ने जो मुझे अनुभव दिया शायद ही मुझे किसी से मिल पाता।
ईश्वर मुझे किसी न किसी तरह से मजबूत बना रहे थे ये अदृश्य रूप से मुझे नजर आ रहा था।
"सत्यम। शिवम। सुंदरम।।"
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